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Showing posts from December, 2012
तन्हाई से दोस्ती  कर ली अकेलेपन पे मात कर ली पलकों का बोज सहे नहीं पा रहे थें आंसुओ के लिए  हमने  राह   कर दी

जी रहा हूँ

डर ड र के जी रहा हूँ  मर मर के जी रहा हूँ  दोस्तों ने दगे दिए  माफ़ करके जी रहा हूँ  झेले गम के कई मौसम  फिरभी हसके जी रहा हूँ  टुटा दिल और टूटे  कई  सपनें  नए सपनों के साथ जी रहा हूँ  तुम तो छोडके चले गए  तुम्हारी यादमें जी रहा हूँ  सुख दुःख तो आवें जावें  यही सोच के जी रहा हूँ  जीने की कोई राह दिखती नहीं  भगवान् भरोसे जी रहा हूँ 

लम्हा लम्हा

लम्हा लम्हा सिसक रही है मेरी जिन्दगी  जाने कैसे कहेते है वो खुबसूरत है जिन्दगी                          *** एक जमाना बित  गया, गम ने मुहं मोड़े  हुए  हमने पेन उठाये हुए, और शेर लिखे हुए                          *** मैं जब उसके ख्वाब में गया ,  वो किसी और के ख्वाब में गयी थी  या तो ये मेरी तक़दीर का दोष था,   या  उसके गुस्ताखी की हद थी 

अश्कों के जाम

अश्कों के जाम पी लेता हूँ  मैं गम को जीत लेता हूँ  तन्हाई जब हद से बढ़ जातीं हैं  खुदसे थोडा बतियाँ लेता हूँ  जब अपने भी पराये से लगते हैं  मैं  गैरों को आजमन लेता हूँ  जब भी ये दिल उदास होता हैं  मैं  तुमको याद कर लेता  हूँ  जब मुश्किलें सुलझा नहीं पता हूँ  परवर दीगर की शरण ले लेता हूँ 

आदमी

कभी ऐसी एकाद गलती कर बैठता है आदमी अपनी  सारी   इज्जत पल में गवाँ   देता है आदमी प्यार के बदले में भी कभी प्यार मिलता है? धीरे धीरे ये बात भी जान लेता है आदमी जैसे ही पुराने जख़म भरने लगते है नए दर्द-ऐ-दिल पाल लेता है आदमी स्वार्थ में अँधा हो कर, अपने  होश गवाँ  कर अपनेही साथियों का गला काट देता है आदमी काहेको ऐसे कडवे   सत्य कहे देते हो जनाब ? नाहक में मन को दुखी कर लेता है आदमी

मै क्यां करूँ?

मैंने तो माँगा था दुआ में तुमको खुदा से ओ  सनम खुदा ने मेरी दुआ कुबूल नहीं की तो  मै क्यां करूँ? मैंने तो तदबीर में कोई कमी ना छोड़ी  थी ओ  सनम तकदीर ने तदबीर का साथ न दिया तो मै क्या करू? मैंने तो सिर्फ गुलाबों का बागान लगाया था ओ सनम गुलाब के साथ कांटें  भी  निकले तो  मै क्यां करूँ? पूर्णमासी  के चाँद की रौशनी में भी मै  खुश था सनम पूर्णमासी  के  रात के बाद भी पौ फाटे मै क्यां करूँ? मै   जिन्दगी के हर पहेलु का मजा ले रहा था सनम जिन्दगी सिर्फ चार दिन की निकली तो मै क्यां करूँ?