Skip to main content

वोही गम

 बरसों के बाद आज फिर मुहसे शायरी निकल गयी ।
 मेरे मौन की मिलकियत न जाने कहाँ खो  गयी ।।

वोही गम, वोही दिल का टूटना, वोही अधूरे ख्वाब ।
इन सब की अब जिन्दगी को आदत सी हो गयी ।।

कहाँ से लाऊ मेरे रोने का सबुत ए दोस्त मेरे?
दो पल की  मुस्कुराहट मेरी तस्वीर में कैद हो गयी ।

क्यां बताऊँ तुम्हें मेरे आँखों  की नमी का राज़ ?
दिलमें रहेने वाली अब  खयालो से भी बहार हो  गयी ।

मेरे  दिल के गम तुम्हे कैसे दिखेंगे जनाब ?
जूठी हसीं के पीछे उन्हें छुपाने की आदत हो गयी ।

आज कल मुझे कुछ भी याद नहीं रहेता।
लगता है मेरे बुढापे की शुरुआत हो गयी।।

तुषार  खेर 

Comments

Popular posts from this blog

क्या करें?

मन मर जाए मौतसे  पहले तो क्या  करें? दर्द-ए-दिल हद से गुजर जाएँ  तो क्या करें? आँख से आंसू  निकल जाएँ   तो क्या करें? संयम मनपे  न रहे   तो क्या करें?  नज़र में उनकी छायी है मदहोशियाँ दिल बे-काबू  हो जाएँ तो क्या करें? दर्द-ए-दिल मौत की वज़ह बने मुमकिन नहीं बेपनाह ख़ुशी से गर मर जाएँ  तो क्या करें?  तुषार खेर 

चहेरे पे चहेरा

दिल में दबाये गम,  चहेरे पे झूठी हँसी लिए, अपने आप को छलता रहा,  बेदर्द ज़माने के लिए|  सूरत-ऐ-आइना काफी था  दिदार-ऐ-दिल के लिए, किसने कहा था मियां चहेरे पे चहेरा लगाने के लिए ? चार दिन जवानी के काफी थे दास्तान-ऐ-मुहबत के लिए, क्यूँ मांगी थी दुआ रब से लम्बी जिंदगानी के लिए ? रहेमत परवर दिगार की काफी थी  जिन्दगी की राह-ऐ-गुज़र के लिए  किसने कहा था मियां, खुद को खुदा समझने के लिए?

चुनाव जो है आये

जिनकी तसवीरें सिर्फ अखबार में देखते थे वो ही नेता आज मेरे द्वार पे हैं दिखें चुनाव जो है आये जिनको संसद में चुप चाप बैठे हुए देखते थे वो ही नेता स्टेज पर दहाड़ते हुए हैं दिखें चुनाव जो है आये जिनको अब तक जनता को लुटते हुए देखते थे वो ही नेता  आज जनता में पैसे लुटाते हुए हैं दिखें चुनाव जो है आये जिनको भ्रष्ट्राचार के दल दल में फसे हुए देखते थे वो ही नेता दूसरों  पे  कीचड़ उछालते हुए हैं दिखें चुनाव जो है आये जिनको जनता की हर मांग को ठुकराते हुए देखते थे वो ही नेता आज उसी जनता से मत मांगते हुए दिखें चुनाव जो है आये