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क्या करें?


न वो तो तेरी सुनता है न ही मेरी सुनता है
उपरवाला तो बस अपने  मन की करता है

न मंदीर में रहेता है न मस्जिद में रहेता है
खुदा अपना ठिकाना कब जग-जाहिर करता है?


सूरज तो रोज डूबता है और रोज निकलता  है
पर अपने गम की रात का कब सवेरा करता है?

कभी इस फुल को चूमता है तो कभी उस फुल को चूमता है
नादान भंवरा कब किसी फूलको हमेंशा अपनाया  करता है

न हिन्दू को छोड़ता है न मुसलमान को छोड़ता है
आतंकवादी का हुम्ला  कहाँ मजहब देखा करता है?

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क्या करें?

मन मर जाए मौतसे  पहले तो क्या  करें? दर्द-ए-दिल हद से गुजर जाएँ  तो क्या करें? आँख से आंसू  निकल जाएँ   तो क्या करें? संयम मनपे  न रहे   तो क्या करें?  नज़र में उनकी छायी है मदहोशियाँ दिल बे-काबू  हो जाएँ तो क्या करें? दर्द-ए-दिल मौत की वज़ह बने मुमकिन नहीं बेपनाह ख़ुशी से गर मर जाएँ  तो क्या करें?  तुषार खेर 

चहेरे पे चहेरा

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